अब तो यह रिवाज सा बन गया है के हिन्दुस्तान के पार्लमेन्ट में जब भी कोई मंत्री या एमपी, फिर वह किसी भी पार्टी के क्यों न हो अपनी बात रखते है तो बात बात में एक शेर जरूर सुनाते है। असल बात यह कि किसी भी बात या मुददो का वजन बढाने के लिए शेर की सहायता जरुरी ली जाती है l इतना ही नही श्रोताओ का दिल जीतने के कई सभा-सम्मेलन में अपने भाषण में नेता या वक्ता एक शेर जरूर सुनाते है और लोगों का दिल जीत लेते है। और ये दिल जितने वाले शेर अक्सर उर्दू भाषा में हि लिखे होते है। एक सर्वे के मुताबिक हिन्दुस्तान के पार्लमेंट में आज तक जितने भी शेर सुनाए गये वो तकरीबन ९०% उर्दू में थे।
जी हां, हम बात हिंदी-उर्दू भाषा की कर रहे है। जो दो सग्गी बहने है। हम सब एक बडी गलत फ़हमी है के उर्दू हमारी नहीं बल्की पडोसी मुल्क की भाषा है। हालांकि यह सरासर गलत है, झूठ है। इस में लोंगों की कोई गलती नही क्यों कि हिन्दू लोग उर्दू को मुश्किल और मुस्लिम की भाषा समझकर बोलने से परहेज रखते आये है । 'रिलिजियस पॉलिटिक्स' ने इस भाषाका बटवारा कर दिया हैं । हालांकी हिंदी में उर्दू इस तरह घुली है जैसे दूध में शक्कर जिन्हे एक दुसरे से १००% अलग करना मुश्किल है l शब्दो का परहेज कर के आप ना तो 'शुद्ध हिंदी' बात कर सकते ना 'शुद्ध उर्दू!' और हिंदी में सिर्फ उर्दू नहीं बल्की पारसी, अफगाणि, गुजराती, कनडा, पोर्तुगीज और अंग्रेजी शब्द भी घुलमील गये है l
हालांकि कोई भी भाषा 'रिजनल' होती है 'रिलिजनल' नही । जैसे पंजाब की पंजाबी, तमिलनाडु की तमिल, गुजरातकी गुजराथी, कर्नाटक की कन्नडी। कहने का मतलब जो मुस्लिम पंजाब में रहते है वो पंजाबी बोलते है। जो गुजरात में रहते है वो गुजराती बोलते है। जो तमिलनाडु में रहते है वो तमिल बोलते है। इस हिसाब से उर्दू को मुस्लिम समाज की भाषा कहना बहोत गलत होगा। वैसे शुरु से उर्दू नॉन-रिलीजस भाषा रही है।
आज लोग भले ही उर्दू भाषा बोलने मे परहेज करते होंगे लेकिन यही उर्दू के शेर, नज्म या शायरी आप जब गुलजार(संपूर्ण सिंग कालरा) के गीतों में, अमिताभ बच्चन (असली नाम इन्कलाब श्रीवास्तव) के डायलोग मे या फिर लता मंगेशकर के गीतों में सुनते तो बड़ा मजा आता है। आप यह समझ ले कि हिंदी-उर्दू सग्गी बहने-बहने है। हिंदी मां है तो उर्दू मौसी। हिंदी नग्मे तभी अच्छे लगते है जब उन्हें उर्दू की झालर लगाई जाती है। जो भी बॉलीवुड की फिल्में हिट हुयी उसका बड़ा श्रेय उर्दू को जाता है। हिंदी फिल्में नयी हो या पुरानी उसके संवाद और गीत उर्दू शब्द के बगैर आप सोच भी नही सकते। इश्क, मोहब्बत, सनम,मेहबूब, जुल्फे, गेसू, दास्ताँ, जमीन, हुजूर,झील,कयामत,मजबूर,सर्द
वैसे उर्दू की पैदास हिन्दुस्तान मे ही हुयी है। कहा जाता है के जब मुगलो का आक्रमण हुवा उस वक्त फ़ारसी का ज्यादा चलन था। जब मुगल शासक आये तब उनके साथ साथ फ़ारसी, अरेबिक और तुर्की यह सब भाषा भारत मे आयी। इन भाषाओं का जब दिल्ली के ब्रज या खड़ी बोली के साथ मिश्रण हुवा तो नयी भाषा का जन्म हुवा। दिल्ली मे जब फारशी शासक के सेनाने शेकडो वर्ष तक डेरा लगाया था तब कुछ सैनिको की भाषा पारसी,कुछ अरेबिक और कुछ तुर्की थी। फिर उनकी भाषा को संबंध दिल्ली के खड़ी बोलि बोलने वाले लोगों से हुवा। आपस के इस बोलि भाषा को 'ओरडु'(सैनिक की भाषा) ऎसा नाम दिया गया l १७८० से पहले उर्दू को रेक्ता, रेक्ती, हिंदवी कहा जाता था और बाद में 'उर्दू' ऐसा नामकरण हुवा। १८ वे सदी तक उर्दू और हिंदीमे बिल्कुल भी फर्क नही था। हालाँकि उर्दू यह शब्द तुर्की से लिया गया। कई किताबें पारसी,तुर्की और अरेबिक मे लिखी गयी। चूँकि उर्दू बादमें बोलि भाषा बन गयी वह तेजी से आगे बढि, बहते गयी और आगे बढी और बाकी भाषाएँ पीछे रह गयी। जब आप कोई भाषामें सिर्फ लिखते हो तो वह 'स्टैटिक' बनती है या थमसी जाती है। लेकिन वही भाषा जब बोली भाषा बनती है तो वह बहाव के साथ 'डायनामिक' बन जाती है। उर्दू के साथ यही हुवा, वह जोरसे बहती चली गयी। बाद में महान कवि आमिर खुसरों ने उसे नये मुकामपर पहुंचाया। उर्दू मे कई शब्द दिल्ली के हिंदी खड़ी बोलीसे लिए गये। दोनों भाषा का व्याकरन एक जैसा है। हिंदी और उर्दू एक दुसरे के इतने करीब है के जब आप हिंदी बोलते हो हो उसमें कई शब्द उर्दू के होते है और आप जब उर्दू बात करते हो तो पच्चास प्रतिशत सेभी ज्यादा शब्द हिंदी होते है। जब हिंदी के शब्द पढने में दिक्कत होती है तो हम सोचते है 'कहीं ये उर्दू शब्द तो नहीं?' इसलिये हिंदी फिल्में नयी हो या पुराणी उसके संवाद और गीत उर्दूके बगैर अधूरे है। आज भारत के ५ स्टेट में उर्दू को राजभाषा का दर्जा है जैसे हैदराबाद, यूपी, बिहार, झारखंड और जम्मू-कश्मीर। आज भारतके कुछ दक्षिण इलाखों में बहोत ही शुद्ध उर्दू बोली जाती है। चूँकि दक्षिणमे तेलगु, कनडा, मलयालम और तमिल जैसे भाषा का ज्यादा प्रभाव है, उर्दू मे कई लोकल शब्द शामिल हुए है।
यह कहना भी सरासर गलत होगा के उर्दू पाकिस्तानी भाषा है। क्योंकि वहाँ उर्दू कम और बाकि भाषाऐ जैसे के बलूची, कश्मीरी, पाशतु, अरबी इ ज्यादा बोली जाती है।उर्दू जबान को १० करोड़ पूर्व पाकिस्तानी मुस्लिम याने आज के 'बांग्लादेश' ने भी कभी नही अपनाया फिर वो पाकिस्तानी भाषा कैसे हो सकती है? पुरब पाकिस्तान याने आज के बांगलादेश की भाषा बांगला है, उर्दू नहीं l पाकिस्तान से जादा हिन्दुस्तान मे उर्दू बोली जाती है। हिन्दुस्तानमे ५ करोड़ तो पाकिस्तान में सिर्फ 1.25 करोड़ जनता उर्दू बोलती है। 'मोहाजिर' याने बटवारे के वक्त जीन मुस्लिमों को यूपी, पंजाब,हरियाणा, कश्मीर और दिल्ली जैसे ईलाखो से पाकिस्तान जाना पड़ा सिर्फ वही मुस्लिम उर्दू भाषा का इस्तेमाल करते है।। 'हम अलग तो हमारी भाषा भी कुछ अलग होना चाहिये' इसलिये पाकिस्तान ने भले ही उर्दू को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया हो लेकिन वो सरासर गलत है क्योंकि वहाँ बोलि भाषा मे उर्दू 'दूसरे स्थान' पर है।
दिलचस्व बात यह है कि १८वे सदि तक सिर्फ और सिर्फ अच्छे जानकार हि इन भाषाको पढ़ और समझ सकते थे। १९वे सदि मे ये दोनों भाषाएँ बहोत विकसित हुई। हिंदी को आगे बढाने मे मुंशी प्रेमचंद, संत कालिदास्, संत तुलसीदास, संत सूरदास और सन्त कबीर जैसे महान संत और साहित्य लेखक का बहोत बड़ा योगदान रहा। आज संपूर्णसिंग कालरा (गुलजार), रघुपति सहाय (फ़िराक़ गोरखबादी), रामप्रसाद बिस्मिल और महाराजा चंदूलाल जैसे गैर-मुस्लीम लेखक या कवि भी है जिन का उर्दूको आगे बढानेमे बढ़ा सहयोग रहा है।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंग का जन्म अब के पाकिस्तान में हुवा था। बहोत कम लोग यह जानते है के उनकी शिक्षा उर्दू में हुई। जब वो प्रधान मंत्री बने तब ६० बरस के रिवाज के मुताबिक उन्हें हिंदी मे भाषण देना जरूरी था। उन्होंने कुल ४८ मिनट भाषण दिया लेकिन बहोत कम लोग यह जानते है के उस भाषण की स्क्रिप्ट उर्दू भाषा में लिखी गयी थी ! क्योंकि डॉ. मनमोहन सिंग को उर्दू पढ़ना ज्यादा आसान लगता है।उर्दू का बहोत सा साहित्य पंजाब से आया है। विशेष बात यह कि उर्दू के कई शायर-लेखक पंजाब से आये है।
सिर्फ सियासत के लिए भाषा को बाटा जाता है l इसलिये जब कोई अगली बार आप से उर्दू में कुछ कहे या कुछ लिखे तो गलतफहमी में ना रहे, क्यों कि वह भी हमारी याने हिन्दुस्तान में पैदा हुई भाषा हैं l सिर्फ मुस्लिम समाज या किसी और देश की तो कतई नही।
तभी तो उर्दू के मशहूर शायर मुनावर राणा ने एक शेर में सही कहा,
'लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है,
मैं उर्दूमें गझल कहता हूँ हिंदी मुस्कुराती है।'
© प्रेमकुमार जैस्वाल

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